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Home»दुनिया»हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा से त्रस्त दुनिया में क्या अब शांति एवं अमन की संभावनाओं पर विराम लग गया है? क्या शांतिपूर्ण नये विश्व की संरचना अब दिवास्वप्न है? रूस और यूक्रेन के लम्बे युद्ध के बाद इजराइल और ईरान का युद्ध विश्व के लिये महाविनाश की टंकार है।
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हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा से त्रस्त दुनिया में क्या अब शांति एवं अमन की संभावनाओं पर विराम लग गया है? क्या शांतिपूर्ण नये विश्व की संरचना अब दिवास्वप्न है? रूस और यूक्रेन के लम्बे युद्ध के बाद इजराइल और ईरान का युद्ध विश्व के लिये महाविनाश की टंकार है।

news61ukBy news61ukJune 21, 2025Updated:August 4, 2025No Comments
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ईरान और इजरायल के तीव्र होते युद्ध से बढ़ते खतरे

ईरान और इजरायल संघर्ष की वजह से दुनिया में अनिश्चिंतता एवं अस्थिरता के बादल मंडरा रहे हैं। विशेषतः तेल के दाम आसमान छूने लगे हैं। पिछले दिनों क्रूड ऑयल के दाम में एक ही दिन में पिछले तीन साल की सबसे बड़ी तेजी देखी गयी है। दोनों देश एक-दूसरे के ऊपर मिसाइलों से हमला कर रहे हैं, परमाणु युद्ध की आशंकाएं उग्र होती जा रही है। दोनों देशों के बीच फिलहाल इस युद्ध के रुकने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है। तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत समेत दुनियाभर के लिए संकट पैदा कर दिया है। क्रूड ऑयल की ग्लोबल डिमांड का 2 प्रतिशत ईरान से आता है। यहां के खरग द्वीप से करीब 90 प्रतिशत तेल बाहर भेजा जाता है। सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि क्रूड शिपमेंट में कमी आई है। पूर्ण युद्ध की स्थिति में ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। इससे होकर दुनिया की 20 प्रतिशत नेचुरल गैस और एक तिहाई तेल ट्रांसपोर्ट होता है। यह रूट बाधित हुआ तो कच्चे तेल में 20 प्रतिशत तक उछाल आ सकता है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के अनुसार इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई से आने वाला कच्चा तेल, जो होर्मुज से होकर गुजरता है, भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 45-50 प्रतिशत है। एक तथ्य यह भी है कि ईरान भी जानबूझकर तेल की कीमतों को आसमान छूने के लिए मजबूर करके ट्रम्प प्रशासन को अस्थिर करने की कोशिश कर सकता है और पश्चिमी देशों में मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है।
ईरान और इजरायल के युद्ध के जटिलतर एवं घातक होते जाने के ही संकेत मिल रहे हैं। इजरायल चाहता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो और अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन का अंत हो। हालांकि इस बात की गारंटी डॉनल्ड ट्रंप या नेतन्याहू में से कोई नहीं ले सकता कि खामेनेई को हटाने से समस्या का समाधान हो जाएगा। यह कैसे कहा जा सकता है कि नई सत्ता को परमाणु ताकत बनने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी, वह भी जब उसके पास अमेरिका और इजरायल के हिसाब से जरूरी साधन मौजूद हैं। इन हवाई हमलों से या जमीन पर सीधी लड़ाई लड़कर भले ही ईरान के इन्फ्रास्ट्रक्चर को खत्म कर दिया जाये, लेकिन ईरान के उस तकनीकी ज्ञान को कैसे खत्म किया जा सकता है, जो ईरानी वैज्ञानिकों ने बरसों की मेहनत से हासिल की है। ऐसे में विदेशी दबाव में हुआ बदलाव ईरान को और ज्यादा कट्टरता की ओर ही ले जायेगा। ऐसे में अमेरिका या इजराइल के हमलों से ईरान में आमूल-चूल परिवर्तन होना संभव प्रतीत नहीं होता। हकीकत में यह काम ईरानी जनता पर छोड़ना चाहिए, बदलाव की मांग वहां से उठनी चाहिए। ईरान के लोग भी अपनी हुकूमत के खिलाफ है, भीतर-ही-भीतर आक्रोश है, इसे आंदोलन का रूप देकर ईरान में सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाना चाहिए। यही ईरान के लिये बेहतरी का रास्ता है, क्योंकि परमाणु हथियार बनाने की जिद्द में बहुत सारे संसाधनों को बर्बाद कर दिया है। इराक, लीबिया, सीरिया – कई उदाहरण हैं, जहां पश्चिमी ताकतों ने अपने हिसाब से बदलाव लाने के प्रयास किये, लेकिन इनमें से कहीं भी नतीजा मन-मुताबिक एवं सफल-सार्थक नहीं रहा। ये देश आज भी अस्थिर हैं। तेहरान को लेकर कोई भी दुस्साहस ईरान को भी इन्हीं मुल्कों की श्रेणी में ला सकता है। ऐसी स्थितियों में कैसे बदलाव की आशा की जा सकती है?
अमेरिका हो या इजरायल, ईरान या दुनिया की अन्य महाशक्तियों उनकी तरफ से ऐसी कोई पहल होती हुई नहीं दिख रही है, जिससे लगे कि वे यह संघर्ष टालना चाहते हैं। इजराइल का कहना है कि वह ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता को खत्म करने के लक्ष्य को हासिल होने तक युद्ध नहीं रोकेगा, लेकिन क्या ऐसा संभव है? ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची का कहना है कि कोई भी बातचीत इजराइली हमले रुकने के बाद ही होगी। दोनों देशों की जिद्द एवं अकड से प्रतीत नहीं होता कि शांति एवं युद्ध विराम का रास्ता संभव है। ईरान निश्चित रूप से दोषी है, दुनिया में अशांति का बड़ा कारण भी है। क्योंकि उसने अपने परमाणु-शक्ति के अपने प्रयासों को इस हद तक आक्रामक रूप से छिपाया कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को भी कहना पड़ा कि ईरान अपने परमाणु अप्रसार दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है। वैसे, इजराइल ने पिछले 15 वर्षों में कई बार ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर निशाना साधा है, लेकिन हर बार वह या तो अमेरिकी दबाव में या अपनी सैन्य क्षमताओं पर संदेह के कारण अंतिम समय पर पीछे हट गया था। सवाल यह भी है कि इस संघर्ष का इराक, लेबनान, सीरिया और यमन पर क्या असर होगा, क्योंकि वहां पर ईरान एक लंबे समय से अपना प्रभाव जमाए हुए है और सशस्त्र उग्रवादियों एवं आतंकवादियों को पोषित करता आया है। हिजबुल्ला की रीढ़ तोड़ने से इस परिदृश्य में बदलाव की शुरुआत पहले ही हो चुकी है और लेबनान-सीरिया में पहले ही इसका लाभ मिल चुका है, जहां नए, बहुलतावादी नेताओं ने सत्ता संभाली है। ईरान के प्रभाव-क्षेत्र से इराक का पलायन भी वहां के लोगों के बीच व्यापक रूप से लोकप्रिय रहा है।
ईरान की जनता अपने शासकों के प्रति नाराज है। वह सत्ता परिवर्तन चाहती है, इसलिये इजराइल से युद्ध में जनता का समर्थन नगण्य है। इसका फायदा इजरायल को मिल रहा है, इसी कारण इजरायल ईरान के शीर्ष मिलिट्री अधिकरियों की सटीक लोकेशन खोजकर उन्हें मार गिराने में सफल हो पायी है। इससे मालूम होता है कि कितने ईरानी अधिकारी इजराइल के लिए काम करने के लिए तैयार हैं, क्योंकि वे अपनी सरकार को नापसंद करते हैं। बावजूद इसके अगर इजराइल अपने प्रयास में विफल हो जाता है और तमाम चोटें खाने के बावजूद ईरान परमाणु हथियार बनाने में सक्षम हो जाता है तो इससे क्षेत्र पहले से कहीं अधिक अस्थिर हो जाएगा।

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