पांवटा साहिब से देहरादून की यात्रा का समय 2 घंटे से घटकर करीब 35 मिनट रह जाएगा।
परियोजना का 31.50 किलोमीटर हिस्सा यातायात के लिए खोल दिया गया है; पूर्ण कार्य फरवरी 2026 तक संपन्न होगा।
हरबर्टपुर, सेलाकुई और सुधोवाला को बायपास करने के लिए 25 किलोमीटर का ग्रीनफील्ड हाईवे बना है।
1,175 मीटर लंबा यमुना नदी पुल और आधुनिक सुरक्षा तकनीक इस कॉरिडोर की खासियत है।
यह मार्ग दिल्ली-देहरादून इकोनोमिक कॉरिडोर से भी सीधे जुड़ेगा।
देहरादून : राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच कनेक्टिविटी को पूरी तरह बदल दिया है। पांवटा साहिब से देहरादून (बल्लूपुर) के बीच बनने वाले फोर-लेन एनएच-07 कॉरिडोर का काम अंतिम चरण में है।
इस परियोजना के पूरा होने से जिस सफर में पहले 2 घंटे लगते थे, वह अब मात्र 35 मिनट में पूरा हो सकेगा। यात्रियों के लिए राहत की बात यह है कि परियोजना के 31.50 किलोमीटर हिस्से पर वाहनों की आवाजाही शुरू कर दी गई है।
भीड़भाड़ वाले इलाकों से मिलेगी मुक्ति
एनएच-07 परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसका ‘ग्रीनफील्ड बायपास’ है। एनएचएआई ने पुराने रूट के बजाय लगभग 25 किलोमीटर का बिल्कुल नया रास्ता (ग्रीनफील्ड हाईवे) तैयार किया है। इससे वाहन चालकों को पांवटा साहिब, हरबर्टपुर, सहसपुर, सेलाकुई और सुधोवाला के संकरे और जाम वाले बाजारों में नहीं फंसना पड़ेगा।
इस नए बदलाव से कुल रास्ते की लंबाई 7 किलोमीटर कम हो गई है। पहले यह मार्ग 52 किलोमीटर का था, जो अब घटकर 44.800 किलोमीटर रह गया है। यह मार्ग सीधे चारधाम यात्रा के पहले पड़ाव यमुनोत्री तक पहुंच को भी सुगम बनाएगा।
1,646 करोड़ की लागत और दो बड़े पैकेज
एनएचएआई इस परियोजना को हाइब्रिड एन्यूटी मोड (HAM) के तहत दो हिस्सों में बना रहा है। कुल 1,646.21 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना में भूमि अधिग्रहण और यूटिलिटी शिफ्टिंग का खर्च भी शामिल है।
पहले पैकेज में पांवटा साहिब से मेदनीपुर तक 18.700 किलोमीटर सड़क बनाई गई है, जिस पर 553.21 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें 1,175 मीटर लंबा चार-लेन का यमुना नदी पुल इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना है।
दूसरा पैकेज मेदनीपुर से बल्लूपुर (देहरादून) तक 26.100 किलोमीटर का है, जिसकी लागत 1,093 करोड़ रुपये है। घनी आबादी के बीच यातायात को बिना रोके चलाने के लिए इसमें कई अंडरपास और सर्विस रोड बनाए गए हैं। इस परियोजना के लिए उत्तराखंड के 21 और हिमाचल के 4 गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था।
सुरक्षा और आधुनिक तकनीक का उपयोग
यात्रियों की सुरक्षा के लिए कॉरिडोर में आधुनिक इंतजाम किए गए हैं। रात में सामने से आने वाली गाड़ियों की लाइट से बचने के लिए एंटी-ग्लेयर स्क्रीन लगाई गई हैं। साथ ही, ऊंचे किनारों पर ‘थ्री बीम क्रैश बैरियर’ लगाए गए हैं।
पूरे रूट की निगरानी 24×7 पीटीजेड (PTZ) कैमरों से की जाएगी। आसन नदी पर भी 105 मीटर लंबा चार-लेन पुल बनाया गया है। बिटुमिन की खपत कम करने के लिए निर्माण में टेंसर तकनीक का इस्तेमाल हुआ है।
दिल्ली-देहरादून कॉरिडोर से सीधा जुड़ाव
यह नया हाईवे सिर्फ स्थानीय ही नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय कनेक्टिविटी का भी केंद्र बनेगा। इसे दिल्ली-देहरादून इकोनोमिक कॉरिडोर से जोड़ा जा रहा है। इससे देहरादून शहर के भीतर से गुजरने वाले भारी वाहनों (थ्रू-ट्रैफिक) को वैकल्पिक रास्ता मिलेगा, जिससे शहर को जाम से बड़ी राहत मिलेगी। भविष्य में यह मार्ग प्रस्तावित देहरादून-मसूरी कनेक्टिविटी से भी जुड़ेगा।
परियोजना का बचा हुआ काम, जिसमें कुछ हिस्सों में आरई वॉल और पेवमेंट का कार्य शामिल है, फरवरी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट के बाद ही तैयार हिस्सों को यातायात के लिए खोला गया है।

